Wednesday, June 7, 2023
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यमन की मानवीय त्रासदी में देवदूत बनकर खड़ी यूएई सरकार

अरब देशों में सबसे गरीब देशों में गिने जाने वाले यमन में क़रीब सात साल से जारी संघर्ष से मानवता तार-तार हो गई है. युद्ध और भुखमरी की वजह से जहां लाखों लोगों की जाने गई है वहीं कुपोषण की मार से अभी महिलायें और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं| युद्ध और मानवीय त्रासदी का सबसे ज्यादा असर महिलाओं और बच्चो पर पड़ा है| बच्चों का भविष्य आज भी अधर में हैं| आगे इन कुपोषित बच्चे और और महलाओं की जिंदगी कैसी होगी, कहना मुश्किल है|
              बता दें कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त, राष्ट्रपति अब्दरब्बू मंसूर हादी की सरकार और उनके प्रति वफ़ादार सैनिकों और शिया हूती विद्रोहियों के बीच मुख्य लड़ाई लम्बे समय से चल रही है है| ये लड़ाई कबतक खत्म होगी कोई नहीं जानता| लेकिन इस लड़ाई ने यमन के सामने अब मानवीय संकट पैदा कर दिया है|पूरी दुनिया यमन की मानवीय त्रासदी को लेकर चिंतित तो है, लेकिन इस संकट से यमन कैसे बाहर निकले इस पर होता हुआ कुछ नजर नहीं आ रहा है|
    हूती विद्रोही यमन में उत्तरी इलाके के शिया मुसलमान हैं| माना जा रहा है कि हूती विद्रोहियों को शिया देश ईरान का समर्थन हासिल है| हूती विद्रोहियों के समर्थन में बार बार ईरान के बयान भी सामने आते रहे हैं|जबकि सरकारी सेनाओं को दक्षिणी यमन के कुछ लड़ाकों और पड़ोसी सुन्नी देश सऊदी अरब से पूरा सहयोग मिल रहा है| यह यूएई और सऊदी अरब देश ही हैं जिसके बल पर आज यमन टिका हुआ है वरना यमन के हालात और भी ख़राब होते|
     सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ मार्च, 2015 से अब तक यमन में ढ़ाई लाख लोग अपनी जान गवां चुके हैं और लाखों लोग घायल हुए हैं. लेकिन युद्ध की इस विभीषिका का सबसे ज्यादा असर बेवा महिलाओं और बच्चो पर पड़ा है| बच्चों का तो भविष्य ही चौपट दिख रहा है| यमन में जारी जंग में, मानव जीवन और मर्यादा बहुत बुरी तरह से आहत हुई है| पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 2.3 मिलियन बच्चों के कुपोषण के शिकार होने का अनुमान है और इनमें से लाखों बच्चों के दवा और उपचार के अभाव में काल के गाल में समा जाने की आशंका जताई जा रही है| आलम ये है कि करीब 20 प्रतिशत लोगों को बुनियादी हेल्थकेयर की सुविधा नहीं मिल रही है और आधी आबादी को शुद्ध और सुरक्षित पेयजल तक नहीं मिल पा रहा है|यमन बर्बाद हो चुका है और निकट भविष्य में उसके आबाद होने की संभावना भी नहीं दिख रही हैं|
      पिछले सात साल में यमन में कई सौ गुना बढ़े कुपोषण के मामलों ने दुनिया भर को चिंता में डाल दिया है| दुनिया के कई देश यमन में जारी मानवीय त्रासदी पर चिंतित ज़रूर हैं लेकिन यमन की रक्षा में देवदूत बनकर केवल यूएई और सऊदी अरब जैसे सहयोगी देश ही खड़े हैं|यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने यमन में अपने राहत प्रयासों का ब्योरा जारी किया है| यूएई सरकार के अनुसार, उसने 2015 से लेकर 2021 तक यमन में राहत और बचाव कार्यों पर 6.25 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए हैं. यूएई सरकार के मुताबिक, उसने कोरोना महामारी से निपटने के लिए छह विमानों से 122 टन दवा, चिकित्सा उपकरण और अन्य सामान यमन में भेजा है| संयुक्त अरब अमीरात ने यमन  में कुपोषण से निमटने के लिए 230 मिलियन डॉलर की भी मदद दी है| यूएई सरकार ने यमन के अन्य क्षेत्रों में भी राहत और इमदादी कार्यों को लेकर विस्तृत ब्योरा जारी किया है. संयुक्त अरब अमीरात के इस मानवीय पहल से यमन को जिंदगी जीने का लाभ तो मिला है लेकिन यह काफी नहीं है| लेकिन संयुक्त अरब अमीरात ने जितना किया है यमन उसका सदा ऋणी बना रहेगा|
      हालांकि यमन के छत्रछाया बने संयुक्त अरब अमीरात को भी हूती विद्रोहियों के आक्रमण का सामना करना पड़  रहा है लेकिन सब कुछ सहकर भी यूएई यमन के साथ हर तरह से खड़ा है|
       हाल के महीनों में, जायंट्स ब्रिगेड्स, एक मिलिशिया समूह, जो बड़े पैमाने पर दक्षिणी यमनियों (यूएई द्वारा समर्थित) से बना है और संयुक्त बलों (मारे गए पूर्व राष्ट्रपति सालेह के भतीजे के नेतृत्व में मिलिशिया) ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ बंदूक उठा ली थी| ऐसा प्रतीत होता है कि हूती विद्रोहियों ने अमीरात को एक स्पष्ट संदेश भेजा है कि वह यमन से दूर रहे या अधिक हमलों का सामना करें|
   बता दें कि यमन रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरू मध्य पर स्थित है, जिसके माध्यम से दुनिया के अधिकांश तेल शिपमेंट गुज़रते हैं|यह अल-कायदा या आईएस से जुड़े-देश के हमलों के खतरे के कारण भी पश्चिम को चिंतित करता है जो अस्थिरता को उत्पन्न करते हैं| अमेरिका द्वारा विद्रोहियों को आतंकवादियों के रूप में सूचीबद्ध करने और सात साल से संघर्ष को कम करने के प्रयासों के बाद भी हूती विद्रोहियों ने राज्य पर सीमा पार हमले तेज़ कर दिये हैं| यही वजह है कि यमन बर्बादी के कगार पर है| यमन को बचाने के लिए यूएई कोशिश तो कर रहा है लेकिन यमन को और मदद की ज़रूरत है|
   याद रहे इस संघर्ष को शिया शासित ईरान और सुन्नी शासित सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय सत्ता संघर्ष के हिस्से के रूप में भी देखा जाता है|
    यमन का संघर्ष भारत के लिए भी कम चुनौती नहीं. भारत के लिये यह एक ऐसी चुनौती है जिसे तेल सुरक्षा और इस क्षेत्र में रहने वाले 8 मिलियन प्रवासियों को ध्यान में रखकर नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है जिनसे सालाना 80 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का प्रेषण होता है| भारत ने भी अतीत में यमन को भोजन और चिकित्सा सहायता प्रदान की है और पिछले कुछ वर्षों में हजारों यमन नागरिक भारत में शिक्षा और चिकित्सा उपचार का लाभ भी उठाते रहे हैं|
   अभी जिस तरह से यूएई यमन के साथ खड़ा है और यमन त्रासदी में अपनी भूमिका निभा रहा है, वह अपने आप में एक मिसाल है| यूएई की तरह ही बाकि दुनिया के देश यमन त्रासदी में अपनी भूमिका निभाएं तो यमन का कायापलट हो सकता है|
Anzarul Bari
Anzarul Bari
पिछले 23 सालों से डेडीकेटेड पत्रकार अंज़रुल बारी की पहचान प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में एक खास चेहरे के तौर पर रही है. अंज़रुल बारी को देश के एक बेहतरीन और सुलझे एंकर, प्रोड्यूसर और रिपोर्टर के तौर पर जाना जाता है. इन्हें लंबे समय तक संसदीय कार्रवाइयों की रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव है. कई भाषाओं के माहिर अंज़रुल बारी टीवी पत्रकारिता से पहले ऑल इंडिया रेडियो, अलग अलग अखबारों और मैग्ज़ीन से जुड़े रहे हैं. इन्हें अपने 23 साला पत्रकारिता के दौर में विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के लिए भी काम करने का अच्छा अनुभव है. देश के पहले प्राइवेट न्यूज़ चैनल जैन टीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर शो 'मुसलमान कल आज और कल' को इन्होंने बुलंदियों तक पहुंचाया, टीवी पत्रकारिता के दौर में इन्होंने देश की डिप्राइव्ड समाज को आगे लाने के लिए 'किसान की आवाज़', वॉइस ऑफ क्रिश्चियनिटी' और 'दलित आवाज़', जैसे चर्चित शोज़ को प्रोड्यूस कराया है. ईटीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर राजनीतिक शो 'सेंट्रल हॉल' के भी प्रोड्यूस रह चुके अंज़रुल बारी की कई स्टोरीज़ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. राजनीतिक हल्के में अच्छी पकड़ रखने वाले अंज़र सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं साथ ही अपने बेबाक कलम और जबान से सदा बहस का मौज़ू रहे है. डी.डी उर्दू चैनल के शुरू होने के बाद फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यूज़ पर आधारित स्पेशल शो 'फिल्म की ज़बान उर्दू की तरह' से उन्होंने खूब नाम कमाया. सामाजिक हल्के में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले अंज़रुल बारी 'इंडो मिडिल ईस्ट कल्चरल फ़ोरम' नामी मशहूर संस्था के संस्थापक महासचिव भी हैं.
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