Saturday, April 13, 2024
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दस मार्च के बाद ‘खेला होबे ‘ की सम्भावना बढ़ी

पिछले बंगाल चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने ‘खेला होबे ‘ का नारा दिया था। तब बीजेपी को ममता का वह नारा महज चुनावी नारा लगा था ,उसे जुमला समझा था। लेकिन ममता ने अपने खेला होबे नारे को सार्थक किया और चुनाव में बीजेपी की सारी राजनीति को ध्वस्त कर सत्ता अपने पक्ष में कर लिया। फिर ममता की दूसरी राजनीति शुरू हुई और बीजेपी को तोडना शुरू किया। चुनाव से पहले जिस तेजी से टीएमसी के नेता विधायक बीजेपी में जा रहे थे ममता की सरकार बनते ही उसी तेजी से बीजेपी में गए नेताओं की वापसी होने लगी। दर्जन भर से ज्यादा विधायक और नेता फिर से टीएमसी में लौटे और आज हालत ये है कि बीजेपी अपना सिर उठाने से भी वहाँ कतरा रही है। अब ममता अगले लोक सभा चुनाव की तैयारी में है और उसके टारगेट पर बीजेपी है। लोकसभा चुनाव को लेकर जो खेल होने हैं उसकी पटकथा दस मार्च के बाद लिखी जानी है।
        दस मार्च के बाद जो पटकथा लिखी जानी है उसका इन्तजार कइयों को है। बीजेपी के भीतर के नेता भी उस पटकथा का इन्तजार कर रहे हैं और बीजेपी के सहयोगी दल भी दस मार्च के परिणाम और उसके बाद की रणनीति पर मंथन कर रहे हैं। एनडीए की कुछ राज्य सरकारें भी  दस मार्च के इन्तजार में है। परिणाम बीजेपी के पक्ष में गए तो संभव है कि तत्काल बहुत कुछ शांत हो जाए। लेकिन अगर परिणाम बीजेपी के पक्ष के विपरीत गए तो बीजेपी की मुश्किलें बढ़ेगी और बड़े स्तर पर खेला होबे की कहानी आगे बढ़ेगी।
       पांच राज्यों के चुनाव परिणाम का सबसे बड़ा असर बिहार पर पडेगा। बिहार में जदयू और बीजेपी के बीच जिस तरह के मनमुटाव चल रहे हैं ,लगता है कि दस मार्च के बाद सरकार को चलाना मुश्किल होगा। जदयू भीतर ही भीतर बीजेपी से नाराज है और बीजेपी भी जदयू के कई नेताओं को अब सहने की हालत में नहीं है। इधर कई मसलों को लेकर जदयू और राजद -कांग्रेस के बीच जिस तरह के प्रेमालाप दिख रहे हैं और नीतीश कुमार की केंद्रीय राजनीति को लेकर जदयू के भीतर तैयारी चल रही है उससे साफ़ है कि दस मार्च के बाद बिहार की राजनीति में बदलाव होंगे। बीजेपी भी इसे अब मानकर ही चल रही है। याद कीजिए नीतीश कुमार पिछले चुनाव के दौरान साफ़ किया था कि यह उनका आख़िरी विधान सभा चुनाव है। बीजेपी भी इस बात को समझ रही है। जाहिर है कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम में बीजेपी अपनी जीत वाली भूमिका नहीं निभा पाती तो बिहार का गठबंधन टूट जाएगा।
     उधर हरियाणा की सरकार पर भी इसका असर पडेगा। हरियाणा की सरकार वैशाखी  टिकी है और वह किसी भी क्षण गिर सकती है। खबर यह भी है कि कांग्रेस नेता हुड्डा बड़े स्तर पर बीजेपी में सेंध लगाने की तैयारी में हैं और माना जा रहा है कि दर्जन भर से ज्यादा विधायक कांग्रेस के टच में है। इन्तजार है दस मार्च के परिणाम का।
         दस मार्च के परिणाम का सबसे बड़ा असर गुजरात और हिमाचल चुनाव पर पड़ने वाला है। इन दोनों राज्यों में इसी साल के अंत में चुनाव होने है और गुजरात में बड़ी संख्या में बीजेपी टूट के कगार पर है। अगर पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी बेहतर प्रदर्शन नहीं करती तो इस बार गुजरात बीजेपी के हाथ से निकल सकता है और ऐसा हुआ तो बीजेपी की जमीन खिसक जाएगी।     लेकिन सबसे बड़ा खेल तो बीजेपी के भीतर होगा। बीजेपी के भीतर मोदी और शाह की राजनीति से पार्टी के कई बड़े नेता नाराज है और उनकी नजर भी दस मार्च के परिणाम पर टिकी है। जिस तरह से यूपी चुनाव से बीजेपी के कई नेताओं को चुनाव से काट कर रखा गया है ,अगर यूपी के चुनाव में बीजेपी की जीत नहीं होती तो पार्टी के भीतर कोहराम होगा होगा और फिर टूट की सम्भाना बढ़ेगी। यूपी चुनाव परिणाम का इन्तजार राजनाथ सिंह को है तो नितिन गडकरी को भी है। संघ के कई नेताओं को भी दस मार्च का इन्तजार है तो वरुण और मेनका गाँधी को भी। चुनाव के परिणाम का इन्तजार तो रवि शंकर प्रसाद को भी और जावड़ेकर को भी। इसके अलावे कई और सवर्ण और पिछड़े -दलित नेताओं को भी चुनाव परिणाम का इन्तजार है।
      जिस तरह के फर्जी चुनावी सर्वे सामने आये हैं उसकी सच्चाई से भी संघ और बीजेपी के बहुत सारे नेता अवगत हैं। लेकिन मौन इसलिए हैं कि मोदी और शाह के फर्जी खेल को समझा जा सके। परिणाम अगर फर्जी खेल के जरिये ही बीजेपी के पक्ष में चले जाते हैं तब संभव है कि बहुत कुछ ठीक हो जाएगा और तत्काल कोई बड़ा खेल नहीं हो लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा।
       पंजाब के बारे में बीजेपी को सब पता है। वहाँ कांग्रेस आएगी या फिर आप। बीजेपी का खेल वहाँ ख़त्म हो चुका है। उत्तराखंड में बहुकोणीय मुकाबला है लेकिन अभी बीजेपी काफी नीचे जा चुकी है इसलिए बीजेपी की जीत की सम्भावना कठिन है। गोवा में इस बार बीजेपी कोई चमत्कार नहीं कर सकती। खेल चाहे जो भी वहाँ कांग्रेस सरकार बनाती दिख रही है और यही हाल मणिपुर की है। बीजेपी का पूरा फोकस यूपी पर है और यूपी में इस बार बहुकोणीय मुकाबला है। बीजेपी और सपा के साथ सीधी लड़ाई है तो बसपा और कांग्रेस किंग मेकर बनने की तैयारी में है। इसके अलावे और भी कई दल बहुत कुछ करते नजर आ रहे हैं। साफ़ है कि बीजेपी के लिए अब कोई सेफ जोन नहीं बचा है। ऊपर से बीजेपी के भीतर सबकुछ ठीक लगता है लेकिन भीतर से बीजेपी का हर नेता अपना दाव खेलता नजर आ रहा है। बीजेपी की उलझन बढ़ गई है।
        एक नजर फिर से बिहार पर। बिहार एनडीए में सब कुछ सामन्य नहीं है। सरकार के मुखिया नीतीश कुमार वैसे भी बहुत कम बोलते हैं लेकिन उनकी पार्टी जदयू बोलने से बाज नहीं आती। उधर बीजेपी के नेताओं के बोल भी कम नहीं हैं। जातीय आरक्षण , शराबबंदी ,सम्राट अशोक के चर्चे ,बेरोजगारी और यूपी के चुनाव को लेकर जदयू और बीजेपी के भीतर जो उफान जारी है ,उसके परिणाम आगे क्या होंगे कहना मुश्किल है। बीजेपी के खेल से जदयू नेता उपेंद्र कुशवाहा भी घायल है तो पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह भी। इधर एक पखवारे के भीतर जदयू और राजद नेताओं के बीच पैबस्त कमरों में जो बाते हुई है उससे बीजेपी भी आहत है। बीजेपी को लगने लगा है कि अब यह गठबंधन लम्बे से तक नहीं चल सकता। बिहार की राजनीति अभी दो मसलों पर चल रही है। एक तो जातीय आरक्षण को लेकर जदयू और राजद एक साथ है और बेरोजगारी को लेकर जदयू और बीजेपी में कुछ ज्यादा ही रार है।
       मान भी लिया जाय कि बिहार में सत्ता परिवर्तन की सम्भावना दिख रही है तो यह साफ़ है कि नीतीश कुमार को इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिखता। राजद के साथ उनकी सरकार बन सकती है और वे फिर सीएम की कुर्सी पर बिराजमान रह सकते हैं। सवाल तो यह है कि इस खेल में राजद को क्या मिलेगा ? वही डिप्टी सीएम का पद ! और एक बदलाव और यह होगा कि बीजेपी के हाथ से सत्ता चली जाएगी। अगर ऐसा भी होता है तो राजद अपने तमाम तरह के नीतीश विरोध अभियान के बाद भी अब जदयू का सहयोग लेकर सरकार बनाने से बाज नहीं आएगी। लेकिन अंदरखाने एक और कहानी पनप रही है। राजद और जदयू के शीर्ष नेताओं के बीच इस बात को लेकर भी मंथन जारी है कि बिहार की सरकार तेजस्वी के हवाले किया जाए और नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में जाएँ। ऊपर से देखने में यह सब वही बाते लग रही है जो काफी समय से कही और समझी जा रही है। लेकिन अब यह खेल मूर्त रूप भी लेता नजर आ रहा है। इस खेल में कांग्रेस भी सहभागी है। कांग्रेस के एक बड़े नेता कहते हैं कि ऐसा हो सकता है। और होना भी चाहिए। नीतीश को बिहार के लिए जो करना था कर चुके हैं। अब वे एक भूमिका केंद्र में फिर से निभा सकते हैं। यह भूमिका किस तरह की होगी यह देखने की बात है लेकिन कोई असंभव भी नहीं।
खबर यह भी मिल रही है कि इस खेल को अंजाम देने में जदयू के भी कई नेता भूमिका निभा रहे हैं। जदयू के दो बड़े नेता पिछले दिनों कांग्रेस के नेताओं से मिले हैं और गंभीर बातचीत हुई है। माना जा रहा है कि कांग्रेस आला कमान अगर इस नयी राजनीति पर सहमत होता है तो बिहार में सरकार भी बदलेगी और केंद्र की राजनीति में एक नया खेल शुरू होगा। बता दें कि जातीय आरक्षण के मसले पर नीतीश कुमार को राजद ,कांग्रेस , लेफ्ट ,हम और वीआईपी का साथ है। इधर राजद के साथ वीआईपी और हम नेताओं की जुगलबंदी भी बढ़ती जा रही है। लेकिन जदयू और हम ,वीआईपी सरकार के साथ है।
जदयू ने नेता मानकर चल रहे हैं कि चुकी  यह सरकार हम और वीआईपी की वैशाखी पर टिकी है और अगर ये दोनों पार्टी सर्कार से समर्थन वापस लेती है तब कुछ नया खेल हो सकता है। लेकिन जानकार मान रहे हैं कि ये सब ऊपरी बाते हैं। राजद ,कांग्रेस नेता  जब चाहेंगे हम और वीआईपी के साथ बात करके खेल को अंजाम दे सकते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि जब सब कुछ राजनीति में संभव है और जदयू -बीजेपी में तल्खी बरकरार है तब इन्तजार क्यों ?
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक़ यूपी चुनाव के बाद कोई बड़ा उलटफेर बिहार में संभव है। हालांकि ऊपर से देखने में यूपी चुनाव का बिहार से कोई लेना देना नहीं लगता लेकिन राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यूपी चुनाव का असर बिहार पर पडेगा ,ऐसा संभव दीखता है।
बिहार के की अधिकांश पार्टियां इस बार यूपी में चुनाव लड़ने पहुँच गई है। और मजे की बात तो यह है कि बिहार एनडीए की गैर सभी बीजेपी पार्टियां यूपी में अकेले दम पर चुनाव लड़ रही है। यह भी कम अनोखी बात नहीं। बिहार में साथ -साथ का राग है तो यूपी में एक दूसरे के दुश्मन। यूपी में बीजेपी के साथ गठबंधन नहीं होने के कारण बिहार एनडीए के घटक दलों, जेडीयू, वीआईपी और हम, ने अकेले चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय ले लिया है। पहले इन दलों को लगता था कि बीजेपी से गठबंधन हो जाएगा लेकिन बीजेपी ने इनको कोई भाव नहीं दिया। अब बीजेपी द्वारा भाव नहीं देने की कहानी बहुत कुछ कहती है। हम और वीआईपी को भले ही चोट कम लगी हो लेकिन जदयू के साथ जो बीजेपी ने किया है उससे नीतीश कुमार काफी आहत बताये जा रहे हैं। बता दें कि जेडीयू के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय इस्पात मंत्री आरसीपी सिंह ने यूपी में विधानसभा चुनाव से पूर्व गठबंधन को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और बीजेपी यूपी प्रभारी और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के साथ कई दौर की बातचीत की, लेकिन बीजेपी नेतृत्व की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। जदयू के भीतर इस बात को लेकर अपमान का भाव है। पूर्वी यूपी के इलाको में बिहार से जुडी पार्टियों का जातीय दबदबा है। और माना जा रहा है कि अगर बिहार एनडीए से जुड़े इन दलों को कुछ सीटें मिल गई तो ये फिर बीजेपी से नहीं जुड़ेंगे। या तो विपक्ष की भूमिका में रहेंगे या फिर गैर बीजेपी दलों के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की कोशिश करेंगे। और फिर एक नयी राजनीति की शुरुआत होगी जो अगले लोक सभा चुनाव में दिखेगी।
बता दें कि हम यानी  हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के नेता और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन मांझी ने अगस्त 2021 में लखनऊ में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य भाजपा नेताओं से मुलाकात की थी। पार्टी ने यूपी में बीजेपी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया था। हम का पूर्वी यूपी में बसे मांझी, मछुआ और केवट समुदायों पर प्रभाव है। हम के एक नेता ने कहा कि भाजपा से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद पार्टी ने यूपी विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने का फैसला किया है। अब हम बीजेपी से लड़ेंगे। अपनी जाति का वोट कम से कम बीजेपी को न जाए इस पर काम करना है।
उधर ,वीआईपी पार्टी के नेता और बिहार के पशुपालन मंत्री मुकेश साहनी ने यूपी में 165 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। इनमें से अधिकांश सीटें निषाद समुदाय के प्रभुत्व वाले पूर्वी यूपी में स्थित हैं। वीआईपी ने पिछले साल 25 जुलाई को डाकू से नेता बनी फूलन देवी की पुण्यतिथि के अवसर पर विभिन्न जिलों में कार्यक्रम आयोजित करके यूपी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
बता दें कि पूर्वी यूपी बीजेपी का गढ़ रहा है और पिछले चुनाव में बीजेपी को यहां बड़ी संख्या में सीट हाथ लगी थी। मोदी और योगी के नाम पर सभी जाति के लोगों ने बीजेपी को वोट दिया था लेकिन इस बार जातीय वोट पर पकड़ रखने वाले नेता अपनी जाति के वोट बैंक को अगर रोक लेते हैं तो बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती है। बिहार एनडीए से जुड़े दलों की यही भूमिका इसबार यूपी में होने जा रही है।
उधर लोकजनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान भी यूपी की सौ सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। खबर के मुताबिक चिराग ने 60 से ज्यादा उम्मीदवारों की सूचि भी तैयार कर ली है। बिहार की ये पार्टियां यूपी में कितना करतव करती है ,यह देखना होगा लेकिन असली खेल तो चुनाव के बाद होगा जब इन बिहार की पार्टियों को कुछ सीटें हाथ लग जाएगी। मार्च के बाद बिहार की राजनीति में भूचाल की सम्भावना है और लगता है कि तब नीतीश को बड़ा फैसला लेंगे।
अखिलेश अखिल
अखिलेश अखिल
पिछले 30 वर्षों से मिशनरी पत्रकारिता करने वाले अखिलेश अखिल की पहचान प्रिंट, टीवी और न्यू मीडिया में एक खास चेहरा के रूप में है। अखिल की पहचान देश के एक बेहतरीन रिपोर्टर के रूप में रही है। इनकी कई रपटों से देश की सियासत में हलचल हुई तो कई नेताओं के ये कोपभाजन भी बने। सामाजिक और आर्थिक, राजनीतिक खबरों पर इनकी बेबाक कलम हमेशा धर्मांध और ठग राजनीति को परेशान करती रही है। अखिल बासी खबरों में रुचि नहीं रखते और सेक्युलर राजनीति के साथ ही मिशनरी पत्रकारिता ही इनका शगल है। कंटेंट इज बॉस के अखिल हमेशा पैरोकार रहे है।
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