Saturday, April 13, 2024
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काफी रोचक होगा गोरखपुर में सीएम योगी को घेरने का खेल

यह बात और है कि गोरखपुर बीजेपी का अभेद्य किला है और सीएम योगी को यहां से हराना कठिन है। लेकिन असंभव भी नहीं। जनता का मूड बदल जाए तो कुछ भी संभव है। योगी को घेरने के लिए समाजवादी पार्टी ने गोरखपुर सदर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ दिवंगत भाजपा नेता उपेंद्र शुक्ला की पत्नी सुभावती शुक्ला को मैदान में उतारा है। उधर भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद भी योगी के खिलाफ चुनाव लड़ने की दुदुम्भी बजा चके हैं। योगी के खिलाफ कांग्रेस और बसपा भी उम्मीदावार उतारेगी। उस पर मंथन चल रहा है। इसके अलावे आम आदमी पार्टी भी गोरखपुर से चुनाव लड़ेगी। कह सकते हैं कि इस बार गोरखपुर राजनीति का केंद्र बन गया है ,सीएम योगी की राह आसान नहीं रह गई है।
        बता दें कि कल गुरुवार को सुभावती शुक्ला अपने दोनों बेटों अरविंद और अमित शुक्ला के साथ सपा में शामिल हुईं। सपा में शामिल होने के बाद मीडिया से बात करते हुए सुभावती शुक्ला और उनके बेटे भाजपा के ऊपर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कैमरे के सामने रो पड़े।
मीडिया से बात करते हुए सुभावती शुक्ला के बेटे अरविंद शुक्ला ने कहा कि मेरे पिता उपेंद्र शुक्ला अपने मृत्यु तक भाजपा में ही रहे। वे प्रदेश स्तर से लेकर मंडल स्तर तक सबको साथ लेकर चले। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हमारे परिवार से मिलने तक नहीं आए। मैं और मेरे भाई कई बार मिलने गए। इसके बाद वे भाजपा के ऊपर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए भावुक हो गए और कहने लगे कि आखिर मेरे परिवार का अपराध क्या है। इन्होंने हमारे परिवार को क्या दिया। इस दौरान सुभावती शुक्ला भी भावुक हो गईं।
वहीं उनके छोटे बेटे अमित शुक्ला ने कहा कि मैं कुछ मांगने नहीं गया था। एक छोटी सी चीज कि मेरे पिता की किसी पार्क में मूर्ति लगा दी जाए या कोई रोड का नाम रख दिया जाए। क्या 40 साल की तपस्या का फल इतना भी उनके हिस्से में नहीं आ सकता था। लगातार हो रहे अपमान और तिरस्कार ने इस तरह का निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया। मैंने सब जगह जाकर अपनी पीड़ा रखी लेकिन कुछ नहीं हुआ। सपा में शामिल होने को लेकर अरविंद शुक्ला ने कहा कि एक नेता को एक नेता ही तलाश लेता है। एक जननेता की पहचान जननेता को ही होती है। वो जननेता मेरे पिता के बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं।
बता दें कि उपेंद्र शुक्ला उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बेहद करीबी थे। वे गोरखपुर क्षेत्र में पार्टी का ब्राह्मण चेहरा थे। वह पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और गोरखपुर के क्षेत्रीय अध्यक्ष जैसे महत्‍वूपर्ण पदों भी रहे। सीएम योगी आदित्यनाथ के लोकसभा से इस्तीफा दिए जाने के बाद उपेंद्र शुक्ला ने ही गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव लड़ा लेकिन वे सपा के प्रवीण निषाद से चुनाव हार गए। उपेंद्र दत्त शुक्ला का मई 2020 में ब्रेन हेमरेज से निधन हो गया था। उपेंद्र शुक्‍ला कौड़राम विधानसभा सीट से तीन बार चुनाव लड़े थे, लेकिन वह तीनों बार हर गए थे।
यह भी सच है कि  गोरखपुर सदर सीट पर बीजेपी का पलड़ा हमेशा से भारी रहा है। 1989 के बाद से अब तक हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सात बार इस सीट पर अपना कब्जा जमाया है और एक बार यह सीट हिंदू महासभा के पास रही है। वर्तमान में राधा मोहन दास अग्रवाल इस सीट से विधायक हैं। राधा मोहन दास अग्रवाल साल 2007 से भाजपा के टिकट पर इस सीट से विधायक चुने जाते रहे हैं।
जहां तक इस सीट पर जातीय समीकरण की बात है तो  4 लाख से अधिक मतदाताओं वाली गोरखपुर सदर सीट में निषाद/केवट/ मल्लाह मतदाता 40 हजार से अधिक हैं। 30 हजार दलित वोटर भी हैं जिनमें पासवान समाज की संख्या सर्वाधिक है।  वैश्य वोटरों में बनिया के अलावा जायसवाल 20-25 हजार हैं, ब्राह्मण 30 हजार से अधिक हैं साथ ही इतनी ही संख्या में राजपूत वोटर भी हैं। 20 – 25 हजार मुस्लिम वोटर भी हैं।  लेकिन सबसे अधिक संख्या में यहां कायस्थों के वोट हैं जो बीजेपी को हर हाल में जाते हैं।
      माना जाता है कि मल्लाह, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ एवं बनिया समेत आधे से अधिक संख्या में दलितों का वोट मठ की आज्ञा के अनुसार ही वोट करेगा और इस बात पर फिलहाल कोई संशय नहीं है। यही अबतक होता रहा है। लेकिन सपा के ब्राह्मण उम्मीदवार के बाद स्थिति अब पहले वाली नहीं रही। यहां खेल तो होगा। इसके बाद आजाद के खड़े होने के बाद दलित वोटों में भी सेंध लगेगी। इसके अलावे कई और जातियों के वोट भी आजाद को मिल सकते हैं। इसके अलावे कांग्रेस और बसपा की उम्मीदारी भी यहां होनी है। अगर सारे दलों के उम्मीदवार खड़े होते हैं तो योगी की परेशानी बढ़ेगी। हालांकि यह भी माना जा रहा है कि सपा की उम्मीदवारी योगी पर सबसे ज्यादा भारी है। लेकिन देखना होगा कि इस सीट का अंतिम  परिणाम क्या होता है।
अखिलेश अखिल
अखिलेश अखिल
पिछले 30 वर्षों से मिशनरी पत्रकारिता करने वाले अखिलेश अखिल की पहचान प्रिंट, टीवी और न्यू मीडिया में एक खास चेहरा के रूप में है। अखिल की पहचान देश के एक बेहतरीन रिपोर्टर के रूप में रही है। इनकी कई रपटों से देश की सियासत में हलचल हुई तो कई नेताओं के ये कोपभाजन भी बने। सामाजिक और आर्थिक, राजनीतिक खबरों पर इनकी बेबाक कलम हमेशा धर्मांध और ठग राजनीति को परेशान करती रही है। अखिल बासी खबरों में रुचि नहीं रखते और सेक्युलर राजनीति के साथ ही मिशनरी पत्रकारिता ही इनका शगल है। कंटेंट इज बॉस के अखिल हमेशा पैरोकार रहे है।
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