Thursday, September 28, 2023
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संभावित विपक्षी एकता को देख बीजेपी ने बनाया 144 का प्लान 

 

विपक्षी एकता का अंजाम क्या होगा, यह तो कोई नहीं जानता. लेकिन इतना तय है कि आगामी लोकसभा चुनाव विपक्ष के लिए ख़ास होगा. और बीजेपी के लिए चुनौती भरा. वैसे अभी जो हालत हैं उसमे बीजेपी की हालत कोई ख़ास ख़राब नहीं है. जनता के मन में पिछले आठ सालों में बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी ने जो भ्रम पैदा किया है, आज भी सिर चढ़कर बोल रहा है. पीएम मोदी की मकबूलियत में कोई कमी नहीं है, और बीजेपी इसी के सहारे आज भी अपना खेल खेलने से नहीं चूक रही है.

इधर बीजेपी कई राज्यों में खेल करती दिख रही है. खेल कही कामयाब भी हुआ तो कही फेल भी. बिहार में भी खेल की पूरी तैयारी थी, लेकिन उसी खेल के खिलाडी नीतीश कुमार बीजेपी के गेम को भांप गए और पलटी मार कर बीजेपी को भौंचक कर गए. बीजेपी को इसका इल्म नहीं था. बीजेपी गुमान में थी, और जदयू को कमजोर जानकार चल रही थी कि नीतीश राजद के साथ तो अब जा नहीं सकते, फिर उन्हें नचाने और जमींदोज करने में कोई गुरेज नहीं. लेकिन बीजेपी को नीतीश ने न सिर्फ चकमा दिया बल्कि महागठबंधन के साथ सरकार में शामिल भी हुए और फिर बीजेपी के खिलाफ बिगुल भी फूंक दिया. बीजेपी कुछ समझ पाती उससे पहले ही नीतीश कुमार दिल्ली पहुंचे और तमाम विपक्षी दलों के नेताओं से मिलकर पटना लौट गए. ऐलान ये हुआ कि सभी विपक्षी मिलकर अगला चुनाव लड़ेंगे और बीजेपी को हराएंगे. लेकिन क्या यह सब इतना आसान है ?

सवाल दो ही है. पहला तो ये कि क्या विपक्ष एक होगा. क्योंकि विपक्ष के कई दल कांग्रेस के खिलाफ हैं और अपने – अपने राज्यों में कांग्रेस से मुकाबला कर रहे हैं. दूसरा सवाल है कि फिर पीएम उम्मीदवार कौन होगा ? नीतीश कुमार साफ़ कर गए हैं कि ये दोनों सवाल अहम हैं और इन सवालों की सच्चाई भी है. लेकिन इतना साफ़ है कि ये सभी दल अगर एक हो जाए तो बीजेपी का सफाया हो सकता है. याद रहे अभी तक बीजेपी को कुल वोट का मात्र 35 फीसदी वोट ही मिलते रहे हैं. जबकि बंटे विपक्ष को 65 फीसदी वोट आज भी मिलते हैं. इन आंकड़ों को जानकार तो लगता है कि विपक्षी एकता के सामने बीजेपी ढेर हो सकती है, लेकिन क्या एकता संभव है ? इसी असंभव स्थिति को देख कर ही तो बीजेपी अपनी राजनीति का विस्तार करती जा रही है.

अंजाम चाहे जो भी हो. लेकिन विपक्षी एकजुटता की कोशिशें फिर परवान चढ़ रही हैं. विपक्षी दलों की संयुक्त मेगा रैलियों के प्लान बनने लगे हैं. राहुल गांधी, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव, केसीआर, मतलब विपक्ष के तमाम बड़े चेहरों ने अपने-अपने घोड़े खोलने शुरू कर दिए हैं. कुछ साथ में तो कुछ फिलहाल एकला चलो की तर्ज पर.

बीजेपी के लिहाज से 2019 के मुकाबले इस बार स्थितियां बदल चुकी हैं. पिछले 3 साल में एनडीए के कई सहयोगी अलग राह पकड़ चुके हैं. सबसे पहले शिवसेना अलग हुई. उसके बाद शिरोमणि अकाली दल. नीतीश कुमार एक बार फिर ‘पलट चाल’ चल चुके हैं. और अब मोदी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता के सूत्रधार की भूमिका में दिख रहे हैं. रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी भी दो फाड़ है. ये तो बात हुई एनडीए सहयोगियों के छिटकने की. बीजेपी के लिए इससे भी बड़ी चुनौती है पिछले प्रदर्शन को बरकरार रखना. ज्यादातर राज्यों में बीजेपी सैचुरेशन लेवल पर पहुंच चुकी है यानी अधिक से अधिक सीटों पर उसका कब्जा है. राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल, त्रिपुरा, अरुणाचल जैसे 8 राज्यों की सभी की सभी सीटों पर बीजेपी का कब्जा है. वोट शेयर भी 50 प्रतिशत से ज्यादा था. मध्य प्रदेश की 29 में से 28 सीटें बीजेपी की झोली में आए थे. महाराष्ट्र की 48 में से 39 सीटें एनडीए को मिली थीं. यानी इन राज्यों में बीजेपी की सीटें बढ़ने से रहीं. हां, घट जरूर सकती हैं. पार्टी इन चुनौतियों की काट के लिए लंबे समय से जमीन पर काम रही है, और 2024 में सीटों का आंकड़ा उसी तरह बढ़ाने की रणनीति तैयार की है, जिस तरह 2019 में 2014 के प्रदर्शन को भी पीछे छोड़ा था. बीजेपी की ये स्ट्रैटजी क्या है, किस बात पर फोकस है, इसे जानने से पहले विपक्ष की रणनीति पर एक नजर डालते हैं.

वैसे बीजेपी के खिलाफ एकजुट होना ही अपने आप में विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. असली पेच यही पर फंसा है कि नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का चेहरा कौन होगा. सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस खुद को नरेंद्र मोदी के स्वाभाविक विकल्प के तौर पर पेश कर रही है. 4 सितंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई ‘हल्ला बोल’ रैली में राहुल गांधी ने दो टूक कहा कि नरेंद्र मोदी का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है. यह बाकी विपक्षी दलों को साफ संदेश था कि अगर बीजेपी को हराना है तो उन्हें कांग्रेस के नेतृत्व में ही एकजुट होना होगा. दूसरी तरफ, बंगाल में जीत की हैटट्रिक के बाद ममता बनर्जी बिना किसी इफ, बट के सीधे-सीधे खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश कर चुकी हैं. एनडीए से फिर अलग होने के बाद नीतीश कुमार भी विपक्षी दलों को एकजुट करने के मिशन में जुट गए हैं. लगातार विपक्षी नेताओं से संपर्क कर रहे हैं. वह खुलकर भले न कह रहे हों, लेकिन नजर तो उनकी भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है. इनके अलावा अखिलेश यादव, केसीआर जैसे विपक्षी क्षत्रप भी मौके की तलाश में हैं.

फिलहाल विपक्ष बिखरा हुआ दिख रहा है, लेकिन एकजुटता की कोशिशें जारी है. इसी कड़ी में इस महीने के आखिर में गैर-कांग्रेसी विपक्षी दल हरियाणा में मेगा रैली कर शक्ति प्रदर्शन करने वाले हैं. 25 सितंबर को हरियाणा में हिसार के नजदीक विपक्ष के दिग्गजों का जमावड़ा होगा. मौका होगा पूर्व उप प्रधानमंत्री देवी लाल की जयंती का. रैली के लिए देश के तमाम विपक्षी दलों को न्यौता दिया गया है. इंडियन नैशनल लोक दल की इस प्रस्तावित रैली में ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, प्रकाश सिंह बादल, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला जैसे विपक्ष के तमाम दिग्गज एक मंच पर नजर आएंगे. इन्होंने मेगा रैली में शामिल होने के लिए हामी भर दी है. इसके अलावा ओम प्रकाश चौटाला ने शरद पवार, केसीआर, चन्द्रबाबू नायडू जैसे नेताओं को भी न्यौता भेजा है. लेकिन अभी इन नेताओं की भागीदारी कन्फर्म नहीं हुई है.

उधर 2024 में जीत की हैटट्रिक के लिए बीजेपी ने केंद्रीय मंत्रियों को अहम जिम्मेदारी दी है. जीती हुई सीटों को बरकरार रखने के अलावा उन सीटों पर खास फोकस किया गया है. जहां पिछले चुनाव में पार्टी दूसरे या फिर तीसरे पायदान पर थी. बड़े केंद्रीय मंत्रियों को 144 सीटों की जिम्मेदारी गई है. इनमें ज्यादातर वो सीटें हैं जहां बीजेपी को पिछले चुनाव में हार मिली थी. गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी चीफ जेपी नड्डा ने मंगलवार को केंद्रीय मंत्रियों के साथ बैठक कर उन्हें मिशन 2024 के लिए जी जान से जुटने के लिए कहा. बीजेपी इन 144 सीटों के लिए पहले ही मई में रोडमैप तैयार कर चुकी है. इन सीटों को डेमोग्राफी और लोकल फैक्टर्स के लिहाज से अलग-अलग क्लस्टर में बांटा गया है. हर क्लस्टर के लिए किसी न किसी मंत्री को इन्चार्ज बनाया गया है. इसके अलावा 25 से ज्यादा सीनियर मिनिस्टर्स में हर क्लस्टर की 3-4 सीटों की खास जिम्मेदारी दी गई है. ये मंत्री संबंधित लोकसभा सीटों के तहत आने वाले सभी असेंबली सेगमेंट की राजनीतिक स्थिति का आंकलन करेंगे. वहां प्रवास कर पार्टी की जमीन मजबूत करेंगे. ये मंत्री इस साल अक्टूबर से अगले साल जनवरी तक ‘प्रवास’ प्रोग्राम का दूसरा चरण करेंगे.

बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 303 सीटों पर जीत हासिल की थी. पिछले चुनाव में भी बीजेपी ने इसी तरह की रणनीति बनाई थी और उन सीटों पर खास फोकस किया था जहां पार्टी जीतते-जीतते हार गई थी. इसका फायदा भी मिला और 2019 में बीजेपी की सीटें 2014 की 282 से बढ़कर 300 के पार पहुंच गई.

मोदी-शाह युग में बीजेपी की मजबूती का एक प्रमुख कारण बूथ मैनेजमेंट है. पार्टी सिर्फ राज्यवार या सीटवार ही नहीं, बूथवार रणनीति तैयार करती है. बूथ भी क्या, वोटर लिस्ट के अलग-अलग पेज तक के लिए बीजेपी की अपनी रणनीति होती है. पन्ना प्रमुखों को इसकी जिम्मेदारी दी जाती है. जिन 144 सीटों पर बीजेपी खास फोकस कर रही है, उनमें से हर सीट की डीटेल प्रोफाइलिंग की गई है. मसलन किस जाति के कितने वोटर हैं, किस मजहब के लोगों की कितनी तादाद है. वोटरों का झुकाव किस तरफ है. और क्यों है, सीट का भूगोल क्या है आदि.

केंद्रीय मंत्री इन लोकसभा सीटों में प्रवास के दौरान हर जाति और वर्ग के लोगों में पैठ बढ़ाने की कोशिश करेंगे. साथ में बूथ-लेवल पर पार्टी को मजबूत करने की कोशिश चल रही है. बीजेपी के लिए अच्छी बात ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज के दौर में इकलौते ऐसे नेता हैं जिनका पूरे देश में जबरदस्त प्रभाव है. उनकी लोकप्रियता के साथ – साथ बीजेपी पीएम आवास, किसान सम्मान निधि, आयुष्मान भारत, उज्जवला, गरीबों के लिए मुफ्त राशन, मुफ्त कोरोना वैक्सीन समेत केंद्र सरकार की तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के करोड़ों लाभार्थियों को साधने की कोशिश कर रही है.

बीजेपी ने जिन 144 सीटों के लिए खास प्लान बनाया है. वो पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, तमिलनाडु जैसे राज्य हैं. पश्चिम बंगाल के अलावा ज्यादातर सीटें दक्षिण भारत के राज्यों की है. बीजेपी ने पिछले चुनाव में बंगाल की 42 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. टीएमसी को 22 सीटें मिली थीं. कई सीटों पर बीजेपी दूसरे नंबर पर रही थी.

दक्षिण भारत के 5 राज्यों-कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना में ही लोकसभा की 129 सीटें हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी इनमें से महज 30 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई थी. इन 30 में से भी 26 सीटें (बीजेपी समर्थित एक निर्दलीय सांसद समेत) अकेले कर्नाटक से हैं. इन राज्यों की ज्यादातर सीटों के लिए रणनीति तैयार की है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ‘मिशन साउथ’ को लीड कर रहे हैं. हाल में हैदराबाद में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी पार्टी के इसी मिशन को धार देने की कोशिश थी.

कर्नाटक में लोकसभा की 28 सीटें हैं, जिनमें से 26 पर बीजेपी+ का कब्जा है. बीजेपी अपनी लाख कोशिशों के बावजूद केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में कुछ खास नहीं कर पाई है. कर्नाटक और तेलंगाना में 2023 में विधानसभा होने हैं. बीजेपी की कोशिश कर्नाटक की तरह ही तेलंगाना में भी सत्ता का स्वाद चखने की है. इसीलिए बीजेपी तेलंगाना में अपनी पूरी ताकत झोंकी हुई है.17 लोकसभा सीटों वाली तेलंगाना में 2019 के चुनाव में बीजेपी ने 4 सीटों पर जीत का परचम लहराया था. पार्टी की कोशिश 2024 में इन सीटों को बरकरार रखने के साथ-साथ मुख्य मुकाबले में हारी हुईं सीटों को भी इस बार अपनी झोली में डालने की है. तेलंगाना में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी टीआरएस और बीजेपी के ही बीच है. यही वजह है कि पीएम मोदी ने हैदराबाद में 3 जुलाई की विजय संकल्प रैली और 26 मई की रैली में भी राज्य की टीआरएस सरकार और मुख्यमंत्री केसीआर पर बेहद तीखे हमले किए थे.

आंध्र प्रदेश में लोकसभा की कुल सीटें 25 हैं. 2019 के चुनाव में बीजेपी यहां खाता तक खोलने में नाकाम रही थी. हालांकि, 2014 में उसे आंध्र प्रदेश की 2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. बीजेपी यहां खुद को जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है. इसी तरह केरल और तमिलनाडु में अपना पैठ बढ़ाने के लिए भी बीजेपी कई तरह का प्रयोग कर रही है.

Anzarul Bari
Anzarul Bari
पिछले 23 सालों से डेडीकेटेड पत्रकार अंज़रुल बारी की पहचान प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में एक खास चेहरे के तौर पर रही है. अंज़रुल बारी को देश के एक बेहतरीन और सुलझे एंकर, प्रोड्यूसर और रिपोर्टर के तौर पर जाना जाता है. इन्हें लंबे समय तक संसदीय कार्रवाइयों की रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव है. कई भाषाओं के माहिर अंज़रुल बारी टीवी पत्रकारिता से पहले ऑल इंडिया रेडियो, अलग अलग अखबारों और मैग्ज़ीन से जुड़े रहे हैं. इन्हें अपने 23 साला पत्रकारिता के दौर में विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के लिए भी काम करने का अच्छा अनुभव है. देश के पहले प्राइवेट न्यूज़ चैनल जैन टीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर शो 'मुसलमान कल आज और कल' को इन्होंने बुलंदियों तक पहुंचाया, टीवी पत्रकारिता के दौर में इन्होंने देश की डिप्राइव्ड समाज को आगे लाने के लिए 'किसान की आवाज़', वॉइस ऑफ क्रिश्चियनिटी' और 'दलित आवाज़', जैसे चर्चित शोज़ को प्रोड्यूस कराया है. ईटीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर राजनीतिक शो 'सेंट्रल हॉल' के भी प्रोड्यूस रह चुके अंज़रुल बारी की कई स्टोरीज़ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. राजनीतिक हल्के में अच्छी पकड़ रखने वाले अंज़र सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं साथ ही अपने बेबाक कलम और जबान से सदा बहस का मौज़ू रहे है. डी.डी उर्दू चैनल के शुरू होने के बाद फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यूज़ पर आधारित स्पेशल शो 'फिल्म की ज़बान उर्दू की तरह' से उन्होंने खूब नाम कमाया. सामाजिक हल्के में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले अंज़रुल बारी 'इंडो मिडिल ईस्ट कल्चरल फ़ोरम' नामी मशहूर संस्था के संस्थापक महासचिव भी हैं.
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