Sunday, February 25, 2024
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मिशन 2024 के लिए यूपी में जेपी प्लान पर बीजेपी की तैयारी

 

कभी बनियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ब्राह्मणो, ठाकुरों और ओबीसी तक तो पहुँच बना ही चुकी है. अब बीजेपी की नजर जाटव और पसमांदा मुस्लिम जातियों पर जा टिकी है. जाटव वोट बैंक पर अब तक बसपा की पकड़ रही है और मुसलमानों में सबसे उपेक्षित वर्ग पसमांदा कांग्रेस, सपा और बसपा के साथ खड़ा रहा है. लेकिन अब पसमांदा पर बीजेपी की ख़ास नजर है. यूपी की योगी सरकार मिशन 2024 के लिए अब नए समीकरण पर काम करती दिख रही है. इस रणनीति में सवर्ण और पिछड़े वर्ग के अलावा जाटव और पसमांदा जातियों को अपने पाले में करने का है. जाटव और पसमांदा के इस समीकरण को जेपी समीकरण के रूप में बीजेपी प्रचारित कर रही है. बीजेपी को लग रहा है कि अगर जेपी समीकरण को साध लिया गया तो 2024 के लोक सभा चुनाव में यूपी की 80 सीटों में बड़ी हिस्सेदारी पर कब्ज़ा किया जा सकता है.

बीजेपी का कुछ महीने पहले चित्रकूट में तीन दिन के प्रशिक्षण शिविर लगाया था. जिसमे 2024 के लिए संघ, संगठन और सरकार तीनों के स्तर पर अब एक साथ उसी दिशा में बढ़ने का रोडमैप बनाया गया था. जहां से पार्टी अपने लिए गेमचेंजर वोट बैंक की आधारशिला रखेगी. 2024 लोकसभा चुनाव के लिए अपने पहले ही ट्रेनिंग कैंप में बीजेपी ने 5 विषयों पर मंथन किया. पहला- 2024 में 80 में से 75 सीटें जीतने का टारगेट. दूसरा- यूपी में नए प्रदेश अध्यक्ष की ताजपोशी और चुनावी भूमिका को लेकर चर्चा. तीसरा विषय- संगठन महामंत्री सुनील बंसल के यूपी से जाने को लेकर. चौथा विषय- राज्य के मंत्रियों और बड़े नेताओं को अनुशासन और काम करने की हिदायत. पांचवां विषय- यूपी में जे और पी वोट बैंक में सबसे बड़ी सेंध.

चुनावी बिसात पर शह और मात के खेल में बीजेपी ने अपनी पहली चाल चल दी है. विरोधी दल भले ही इसे समझने में देर कर दें या चूक भी जाएं, लेकिन पार्टी अपने मिशन को लेकर आश्वस्त है. 2024 में जे यानी जाटव और पी यानी पसमांदा मुसलमान. इन्हीं दोनों के सहारे बीजेपी उस सियासी खेल का बाज़ीगर बनना चाहती है, जिसमें खोने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए सबकुछ है. जाटव तीन दशक से मायावती यानी बसपा का परंपरागत वोट बैंक रहे हैं, तो वहीं पसमांदा मुसलमान कभी कांग्रेस, कभी बसपा तो कभी समाजवादी पार्टी के खेमे में आते – जाते रहे हैं.

जाटव और पसमांदा मुस्लिम ये दोनों ऐसा वोट बैंक हैं, जो पिछले क़रीब 5 चुनाव में इधर से उधर शिफ्ट होते रहे हैं. हैरानी की बात ये है कि पसमांदा मुसलमान बीजेपी के खाते में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं. ये दोनों ही वोट बैंक समाज के उस वर्ग से ताल्लुक़ रखते हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं. इसलिए तमाम सरकारी योजनाओं में ये दोनों ही वर्ग शामिल रहते हैं. यानी योजनाओं की रूपरेखा बनाते समय भी और योजनाओं के लाभार्थियों में भी पसमांदा मुसलमान और जाटव हिस्सेदार रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में जे यानी जाटव क़रीब 11% हैं और बसपा का आधार वोट भी यही हैं. यानी मायावती के 22% दलित वोटों में आधी हिस्सेदारी जाटव वोटर्स की है. इसी तरह पी यानी पसमांदा मुसलमान राज्य के क़रीब 20% मुसलमानों में 16% हिस्सेदारी रखते हैं. यूपी के कुल मुस्लिम समुदाय में पसमांदा मुसलमान 80% के आसपास हैं. लेकिन, हैरानी की बात ये है कि ये वर्ग शिक्षा, रोज़गार, आर्थिक विकास से महरूम है. जबकि ये हर लिहाज़ से सबसे बड़ा वोटबैंक हैं. बीजेपी 2014, 2017, 2019, 2022 में अब तक लगातार जाटव और पसमांदा मुसलमानों के कुछ बहुत वोट हासिल करती रही है. लेकिन, 2019 और 2022 के चुनाव नतीजों के बाद संघ, संगठन और मोदी सरकार तीनों इस बात पर एकमत हैं, कि समाज के इन दोनों वर्गों को सरकारी योजनाओं का सबसे ज़्यादा लाभ मिलना चाहिए और मिलता रहे. क्योंकि, बुनियादी सुविधाएं, फ्री राशन, उज्ज्वला गैस कनेक्शन, पीएम आवास, हर घर शौचालय समेत तमाम योजनाओं के केंद्र में समाज का जो वर्ग रहता है, उसमें जाटव और पसमांदा मुस्लिमों की हिस्सेदारी 26% है.

इसी 26% आबादी पर अपनी नीतियां केंद्रित करके बीजेपी ने चुनावी रणनीतियां बनाई हैं. इसके लिए सबसे पहले सरकार और संगठन के स्तर पर ये तय किया गया है कि केंद्र और राज्य की उन योजनाओं का आक्रामक तरीके से प्रचार-प्रसार किया जाए, जो ग़रीबों के लिए बनाई और क्रियान्वित की गई हैं. इससे एक तीर से दो निशाने साधे जाएंगे. पहला ये कि योजनाओं का फ़ायदा उन लोगों तक पहुंचाने की तस्दीक करना, जो इसके असली हक़दार हैं. और दूसरा ये कि सरकार और संगठन दोनों ऐसे वर्ग से सीधे जुड़ेंगे. इस जुड़ाव के ज़रिये ज़्यादा से ज़्यादा चुनावी फ़ायदा हासिल करने की कोशिश होगी.

2014 के लोकसभा चुनाव में जिस वक़्त अबकी बार मोदी सरकार का नारा सियासी रूप से परवान चढ़ रहा था, उसी समय मुस्लिम वर्ग में ये कन्फ़्यूज़न तैर रहा था कि क्या प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी हर वर्ग को समान रूप से देखेंगे. जब प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी की जीत सुनिश्चित हुई तो उन्होंने अपने संबोधन में ये भरोसा दिया कि हर वर्ग को समान रूप से अधिकार हासिल हैं. सबके अधिकारों की समान रूप से चिंता की जाएगी. इसी की वजह से 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम वर्ग की पसमांदा बिरादरी पर ज़ोर दिया गया. इसे सरकारी योजनाओं का लाभ कहिए या घर-घर प्रचार-प्रसार की पुख़्ता रणनीति, लेकिन बीजेपी को 2014 से 2022 तक 4% से लेकर 8% तक पसमांदा मुसलमानों का वोट हासिल हुआ है.

यानी बीजेपी ने बेहद माइक्रो लेवल पर चुनावी नतीजों की समीक्षा करके ये रणनीति तैयार की है, जिसका मुख्य केंद्र इस बार यूपी में जाटव और पसमांदा मुस्लिम होंगे. इन दोनों वर्ग के वोट बैंक पर बीजेपी के फ़ोकस करने की एक और मुख्य वजह है. दोनों ही वर्ग अपने-अपने पारंपरिक राजनीतिक दलों में सिर्फ़ वोट बैंक ही समझे जाते हैं. जाटव वोटों के नाम पर बसपा ये मानकर चलती है कि उनके वोट तो बसपा का बैनर और टिकट देखते ही उसके खाते में आ जाएंगे. ठीक उसी तरह पसमांदा मुसलमान भी समाजवादी पार्टी या मुस्लिम संगठनों के लिए वोट बैंक या भीड़ जुटाने का अहम ज़रिया हैं. यानी इन दोनों ही वर्गों के लिए अपने-अपने पारंपरिक दलों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर आगे बढ़ने के मौक़े ना के बराबर हैं.

बीजेपी के पास संगठन के रूप में हर स्तर पर मोर्चे, प्रकोष्ठ और शाखाएं हैं कि वो इन दोनों वर्गों से जुड़े लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकती है. ऐसे में उनका भरोसा और वोट दोनों हासिल करना आसान हो सकता है. बहरहाल, जाटव और पसमांदा मुसलमानों पर बीजेपी की बाज़ी का नतीजा क्या होगा, ये कहना मुश्क़िल है.

हालांकि, यूपी में मोदी-योगी की डबल इंजन वाली सरकार, बीजेपी और संघ मिलकर 2024 के लिए विजय पथ का जो एक्सप्रेस वे तैयार कर रहे हैं, उसमें कुछ रुकावटों का आना तय है. जाटव वोट बैंक को अपने पास रोके रखने के लिए बसपा प्रमुख मायावती पूरी ताक़त झोंक सकती हैं. लेकिन, देखना ये होगा कि कहीं वो 2024 में भी 2022 वाली ग़लती ना दोहराएं. क्योंकि, जाटव वोट बैंक ने अगर मायावती को 2022 की तरह निष्क्रिय भूमिका में देखा, तो वो टूटकर बीजेपी की लुभावनी रणनीति पर भरोसा करने के लिए मजबूर हो जाएंगे. वहीं, पसमांदा मुसलमानों ने क़रीब डेढ़ दशक से समाजवादी पार्टी का दामन थाम रखा है, लेकिन मुस्लिम लीडरशिप को लेकर सपा में चल रहे कन्फ्यूज़न और अखिलेश-आज़म समेत तमाम मौलानाओं और मुस्लिम संगठनों की समाजवादी पार्टी से चल रही नाराज़गी को बीजेपी कैश कराने की कोशिश करेगी.

Anzarul Bari
Anzarul Bari
पिछले 23 सालों से डेडीकेटेड पत्रकार अंज़रुल बारी की पहचान प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में एक खास चेहरे के तौर पर रही है. अंज़रुल बारी को देश के एक बेहतरीन और सुलझे एंकर, प्रोड्यूसर और रिपोर्टर के तौर पर जाना जाता है. इन्हें लंबे समय तक संसदीय कार्रवाइयों की रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव है. कई भाषाओं के माहिर अंज़रुल बारी टीवी पत्रकारिता से पहले ऑल इंडिया रेडियो, अलग अलग अखबारों और मैग्ज़ीन से जुड़े रहे हैं. इन्हें अपने 23 साला पत्रकारिता के दौर में विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के लिए भी काम करने का अच्छा अनुभव है. देश के पहले प्राइवेट न्यूज़ चैनल जैन टीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर शो 'मुसलमान कल आज और कल' को इन्होंने बुलंदियों तक पहुंचाया, टीवी पत्रकारिता के दौर में इन्होंने देश की डिप्राइव्ड समाज को आगे लाने के लिए 'किसान की आवाज़', वॉइस ऑफ क्रिश्चियनिटी' और 'दलित आवाज़', जैसे चर्चित शोज़ को प्रोड्यूस कराया है. ईटीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर राजनीतिक शो 'सेंट्रल हॉल' के भी प्रोड्यूस रह चुके अंज़रुल बारी की कई स्टोरीज़ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. राजनीतिक हल्के में अच्छी पकड़ रखने वाले अंज़र सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं साथ ही अपने बेबाक कलम और जबान से सदा बहस का मौज़ू रहे है. डी.डी उर्दू चैनल के शुरू होने के बाद फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यूज़ पर आधारित स्पेशल शो 'फिल्म की ज़बान उर्दू की तरह' से उन्होंने खूब नाम कमाया. सामाजिक हल्के में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले अंज़रुल बारी 'इंडो मिडिल ईस्ट कल्चरल फ़ोरम' नामी मशहूर संस्था के संस्थापक महासचिव भी हैं.
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