Sunday, February 25, 2024
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शिवसेना विवाद : जलती मशाल लिए नर्तन करते शिवसैनिकों की हुंकार के राजनितिक मायने 

 

अखिलेश अखिल

कल क्या होगा कौन जानता है ? भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है यह भी कौन बताएगा ? बड़े – बड़े भगवान् भक्त और कथित धार्मिक पार्टियां भी नहीं कह सकती. अगले चुनाव में जनता उसके साथ क्या सलूक करने वाली है. शिवसेना विवाद के बाद महाराष्ट्र में जो कुछ भी होता दिख रहा है. उससे केवल भविष्य का अनुमान ही लगाया जा सकता है. कहने के लिए शिंदे गुट के पास अभी बड़ी संख्या में शिवसैनिक विधायक हैं. शिंदे सरकार के मुखिया हैं. आगामी राजनीति को लेकर वो ताल भी ठोक रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि बीजेपी के साथ उनकी राजनीति अमर रहेगी. लेकिन यही तो भविष्य की बात है.

वर्तमान ये है कि उद्धव गुट वाले शिवसैनिक पूरे सूबे में नर्तन करते दिख रहे हैं. जब से केंद्रीय चुनाव आयोग ने शिवसेना द्वारा सुझाए गए नए नाम ‘शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे’ और जलती हुई ‘मशाल’ चुनाव चिह्न आवंटित किया है, शिवसैनिक हाथ में मशाल लिए सड़कों से लेकर गांव गलियों तक झूम रहे हैं. नारा एक ही है शिंदे को सबक सिखाएंगे — शिवसैनिकों का यह नर्तन बहुत कुछ कहता है. तकरार की राजनीति की तरफ संकेत भी करता है. भले ही नया नाम और नई निशानी हो लेकिन लाखोें शिवसैनिकों का वही ‘पुराना’ विश्वास बना हुआ है… विरोधियों को चारों खाने चित करेंगे, जीतेंगे! आयोग का फैसला घोषित होते ही राज्य भर में जगह-जगह सैकड़ों शिवसैनिक ‘धधकती मशाल’ हाथ में लेकर सड़कों पर उतर गए. कहते रहे कि यह गद्दारों के पृष्ठभाग में आग लगाने वाला है.

लेकिन खेल यही तक का नहीं है. कल उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे ने जो कहा और सामना के सम्पादकीय में जो लिखा गया. उस पर भी विचार करने की जरूत है. आदित्य ठाकरे वर्ली इलाके में एक सभा को सम्बोधित करने पहुंचे थे. उन्होंने कहा कि ‘खोके सरकार में गद्दारों के गुट ने बेशर्मी की हद पार कर दी है. गद्दारों की तरफ से बहुत निचले स्तर की राजनीति चल रही है. महाराष्ट्र और देश ने इतनी गंदी राजनीति कभी नहीं देखी’. ऐसी शाब्दिक तोप दागते हुए शिवसेना नेता व युवासेना प्रमुख आदित्य ठाकरे ने कठोर शब्दों में कहा कि ‘शिवसेना को खत्म करने की ‘खोकासुर’ की साजिश कभी सफल नहीं होगी.’ आदित्य ठाकरे पूरे रोष और जोश में थे. पत्रकारों ने कई और सवाल दागे. हर सवाल का जबाव रोष में ही मिला.

आदित्य ठाकरे ने आगे कहा कि शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने 40 गद्दारों को सब कुछ दिया. उनकी खुद की कोई पहचान नहीं है. और अब मेरे दादा का नाम लेकर राजनीति कर रहे हैं. लेकिन जनता गद्दारों को स्वीकार नहीं करेगी. यह उल्लेख करते हुए पीठ में खंजर क्यों घोंप रहे हो ? तुममें हिम्मत है तो सामने आकर वार करके दिखाओ. विधायक पद से इस्तीफा देकर चुनाव का सामना करके दिखाओ. राज्य में बीते चार महीनों से असंवैधानिक सरकार बैठी हुई है. देश में ऐसी सरकारें आती हैं, तो वो भारतीय संविधान के लिए ही खतरा पैदा कर सकती हैं. आदित्य ठाकरे ने ऐसी आशंका भी व्यक्त की.

आदित्य ठाकरे ने आगे कहा कि जनता शिवसेना के साथ मजबूती से खड़ी है. ‘खोके’ सरकार ने खुद को बेच दिया है. पिछले कुछ दिनों में दो-तीन नेताओं के बयानों से पता चलता है कि शिवसेना को खत्म करने की साजिश पिछले ढाई साल से चल रही है. यह सामने आ गया है. गद्दार अपनी राक्षसी महत्वाकांक्षाओं के लिए शिवसेना को खत्म करने के लिए निकल पड़े हैं. उन्हें इसका राक्षसी आनंद हो रहा है. आदित्य ठाकरे ने आगे कहा कि हालांकि महाराष्ट्र और देश की जनता मजबूती से शिवसेना के साथ खड़ी है और यही लोग खोकासुरों की साजिशों को कभी सफल नहीं होने देंगे.

सामना के सम्पादकीय में भी शिंदे गुट और बीजेपी पर प्रहार किया गया. सम्पादकीय में लिखा गया है कि सत्य और हत्या छुपी नहीं रहती है. लेकिन शिंदे-फडणवीस युग में असत्य की भी पोल खुल रही है. चुनाव आयोग ने धनुष-बाण चिह्न को फ्रिज करके शिवसेना नाम के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी. इस अन्याय के खिलाफ पूरे महाराष्ट्र का मन धधक उठा है. इस बीच शिंदे गुट के प्रवक्ता और राज्य के शिक्षा मंत्री केसरकर ने चुनाव आयोग के फैसले को सत्य और न्याय की जीत बताया है. दुनिया में न्याय है, ऐसा केसरकर जैसे बजारियों को लगना स्वाभाविक ही है. क्योंकि यह इंसान कभी किसी का नहीं हो सका. कई पार्टियों में घूमकर ये महोदय शिवसेना में आए और मंत्री पद मिलते ही शिंदे गुट में शामिल हो गए.

सामना ने लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी और उनके मौजूदा सूत्रधार नामर्द हैं. इसलिए उन्होंने सीधे लड़ने की बजाय शिवसेना का अस्तित्व दस्तावेजों से खत्म करने का घिनौना कार्य किया. उन्हें मुंबई पर कब्जा जमाना है. हमने कहा, ‘मुंबई महाराष्ट्र की और महाराष्ट्र देश का है. मुंबई पर कब्जा जमाने के बजाय चीन द्वारा निगली गई लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश की जमीन पर कब्जा हासिल करो.’ हमने कहा, ‘मुंबई देश का पेट और तिजोरी भर रही है. मुंबई को लेकर क्या बैठे हो? पहले पाक अधिकृत कश्मीर को कब्जे में लेकर वीर सावरकर के अखंड हिंदुस्थान का सपना साकार करो. आप शिवसेना को पराजित नहीं कर सकते. जनता की विराट सेना हमारे साथ है.’ लेकिन उनकी आमने-सामने लड़ने की हिम्मत हुई ही नहीं. उन्होंने शिंदे गुट के बृहन्नला और शिखंडी को आगे करके शिवसेना की पीठ में तीर घोंपा. इससे महाराष्ट्र चिंतित है.

शिंदे पर प्रहार करते हुए सामना ने लिखा है कि जिस शिवसेना का जन्म प्रबोधनकार ठाकरे के आशीर्वाद से हुआ, जिस प्रबोधनकार ने मराठी लोगों के संगठन को ‘शिवसेना’ ज्वलंत नाम दिया. और जिस शिवसेना के लिए अपने सुपुत्र बाल केशव ठाकरे को महाराष्ट्र की सेवा के लिए अर्पित कर दिया, उस शिवसेना का अस्तित्व मिटाने का अधम और नीच कार्य जैसे एकनाथ शिंदे सुपारीबाज ने किया. वैसा उस मंडली ने नहीं किया. शिवसेना यानी सभी राजनीतिक पार्टियों में मराठी जनों की मां है. इस मां पर हाथ डालने का व्यभिचारी कृत्य जिसने भी किया, उनका महाराष्ट्र की 12 करोड़ जनता के श्राप से राजनीतिक विनाश हुए बिना नहीं रहेगा. ऐसा रोष महाराष्ट्र के घर-घर से व्यक्त किया जा रहा है. केंद्रीय संस्थाएं और एजेंसियां दिल्ली के सत्ताधारियों की गुलाम बन गई हैं. सामने से लड़ने की हिम्मत इनमें नहीं है. इसलिए वो चुनाव आयोग जैसी संस्था का उपयोग कर रहे हैं.

सामना आगे लिखता है कि शिवसेना एक चमत्कार है. ईश्वरीय अवतार का अंश है. भगवान शंकर द्वारा विष प्राशन करते हुए एक बूंद पृथ्वी पर गिरी. उस बूंद से शिवसेना की अग्नि प्रकट हुई. इसलिए सभी तरह के विष पचाकर शिवसेना मजबूती के साथ खड़ी है. जिसने शिवसेना और धनुष-बाण को प्राजित करने की नीच हरकत की, उसका राजनीतिक अंत शिवसेना के तीर से ही होगा. ऐसे कई शिंदे व मिंधे आते-जाते रहते हैं. गद्दारों के लिए इतिहास में कभी स्थान नहीं होता. वीर गाथाएं तो मर्दों और स्वाभिमानियों की गाई जाती हैं. खोकेबाज मिंधे पर लोग थूकते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने शिवसेना के मामले में अपना घिनौना खेल खेला. अब आगे क्या ? सत्ता का गैर इस्तेमाल, धन का उपयोग करके तुमने जो किया है, वह आखिरी छोर है. उस किनारे पर आज शिवसेना है और उड़ान भरने के लिए पूरा आसमान खुला है. जैसे शिवसेना का पुनर्जन्म होता हम देख रहे हैं.

सामना आगे लिखता है कि शिवसेना की आत्मा वही रहेगी, रंग-रूप भी वही रहेगा. वस्त्र बदलेगा, आत्मा वैसे बदलेगी ? मिंधे गुट का कोई विचार नहीं है. मुखौटे के पीछे भ्रष्ट, बेईमान गैंडे की खाल है. महाराष्ट्र की जनता ने खोको की चिता जलाई तो गैंडे की खाल भी जल जाएगी. ये तो अफजल खान, औरंगजेब के विचारों की औलाद है. महाराष्ट्र के दुश्मनों को दफन करना चाहिए. उनकी कब्र पर केवल इतना ही लिखा जाए, ‘यहां महाराष्ट्र के गद्दारों को स्वाभिमानी मराठी जनता ने हमेशा के लिए गाड़ दिया है!’ उस कब्र पर आपके नाती-पोते भी थूकेंगे!

सामना का यह सम्पादकीय बहुत कुछ कहता है. यह बात और है कि उद्धव गुट को पार्टी का नया नाम और नया चुनाव चिन्ह मिल गया है. लेकिन शिवसैनिकों के भीतर जो आग फैली है. उसे भला कौंन रोक सकता है ? जानकार मान रहे हैं कि आने वाले हर चुनाव में शिवसेना के दोनों गुटों में द्वन्द बढ़ेगा और संभव है कि लड़ाई हिंसक भी होती जायेगी. और ऐसा हुआ तो इस आग में दोनों गुटों का नाश होगा. और यही बीजेपी चाह रही है. बीजेपी को कोई चुनौती देने वाल नहीं चाहिए और न ही कोई धर्म की राजनीति करने वाली दूसरी पार्टी.

Anzarul Bari
Anzarul Bari
पिछले 23 सालों से डेडीकेटेड पत्रकार अंज़रुल बारी की पहचान प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में एक खास चेहरे के तौर पर रही है. अंज़रुल बारी को देश के एक बेहतरीन और सुलझे एंकर, प्रोड्यूसर और रिपोर्टर के तौर पर जाना जाता है. इन्हें लंबे समय तक संसदीय कार्रवाइयों की रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव है. कई भाषाओं के माहिर अंज़रुल बारी टीवी पत्रकारिता से पहले ऑल इंडिया रेडियो, अलग अलग अखबारों और मैग्ज़ीन से जुड़े रहे हैं. इन्हें अपने 23 साला पत्रकारिता के दौर में विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के लिए भी काम करने का अच्छा अनुभव है. देश के पहले प्राइवेट न्यूज़ चैनल जैन टीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर शो 'मुसलमान कल आज और कल' को इन्होंने बुलंदियों तक पहुंचाया, टीवी पत्रकारिता के दौर में इन्होंने देश की डिप्राइव्ड समाज को आगे लाने के लिए 'किसान की आवाज़', वॉइस ऑफ क्रिश्चियनिटी' और 'दलित आवाज़', जैसे चर्चित शोज़ को प्रोड्यूस कराया है. ईटीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर राजनीतिक शो 'सेंट्रल हॉल' के भी प्रोड्यूस रह चुके अंज़रुल बारी की कई स्टोरीज़ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. राजनीतिक हल्के में अच्छी पकड़ रखने वाले अंज़र सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं साथ ही अपने बेबाक कलम और जबान से सदा बहस का मौज़ू रहे है. डी.डी उर्दू चैनल के शुरू होने के बाद फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यूज़ पर आधारित स्पेशल शो 'फिल्म की ज़बान उर्दू की तरह' से उन्होंने खूब नाम कमाया. सामाजिक हल्के में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले अंज़रुल बारी 'इंडो मिडिल ईस्ट कल्चरल फ़ोरम' नामी मशहूर संस्था के संस्थापक महासचिव भी हैं.
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