Sunday, February 25, 2024
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म्यांमार की सैन्य अदालतों ने गोपनीय तरीके से 130 लोगों को सुनाई मौत की सजा 

पिछले साल म्यांमार में सेना द्वारा तख्तापलट की घटना को अंजाम दिया गया था. उसके बाद वहां की गोपनीय सैन्य अदालत ने अबतक 130 लोगों को मौत की सजा सुनाई है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टूर्क ने इस सप्ताह इन अदालतों द्वारा सुनाए गए नवीनतम फ़ैसलों की पृष्ठभूमि में यह जानकारी दी है. मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि सेना ने गोपनीय अदालतों में मुक़दमों की प्रक्रिया जारी रखी है, जोकि निष्पक्ष कार्रवाई के बुनियादी सिद्धान्तों का उल्लंघन है, और स्वतंत्रता व निष्पक्षता की न्यायिक गारंटी के विपरीत भी. यूएन कार्यालय प्रमुख ने मौत की सज़ा के सभी मामलों को टाले जाने और मृत्युदंड पर स्वैच्छिक रोक फिर से बहाल किए जाने का आग्रह किया है.

जानकारी के अनुसार, सैन्य अदालत ने पिछले बुधवार को युनिवर्सिटी के कम से कम सात छात्रों को मौत की सज़ा सुनाई है. वहीं, ख़बरों के अनुसार गुरूवार को, युवा कार्यकर्ताओं को मृत्युदंड सुनाए जाने के कम से कम चार मामले सामने आए हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने इन मामलों पर स्पष्टीकरण का अनुरोध किया है. इस वर्ष जुलाई महीने में, सेना ने चार मामलों में मृत्युदंड दिया था, और पिछले लगभग तीन दशकों में ऐसा पहली बार हुआ था.

बता दें कि फ़रवरी 2021 में सैन्य तख़्तापलट के बाद, विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिये क़रीब साढ़े 16 हज़ार लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इनमें से एक हज़ार 700 लोगों पर सैन्य ट्राइब्यूनल में गोपनीय ढंग से मुक़दमा चलाया गया और दोषी क़रार दिया गया. कुछ मामलों में तो मुक़दमे की कार्रवाई केवल कुछ मिनट ही चली. जिन लोगों पर मुक़दमा चलाया गया, बहुत से मामलों में उन्हें ना तो वकील उपलब्ध कराया गया और ना ही परिवार से मिलने की अनुमति दी गई. इस तरह से 1 फ़रवरी 2021 को सैन्य तख़्तापलट के बाद से अब तक मृत्युदंड पाने वाले लोगों की संख्या 139 तक पहुँच गई है.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने ध्यान दिलाया कि सैन्य अदालतों की यह कार्रवाई आसियान की शान्ति योजना के अनुरूप नहीं है, जोकि पाँच-सूत्री सहमति पर आधारित है, जिसके प्रति आसियान देशों ने पिछले महीने शिखर बैठक के दौरान प्रतिबद्धता फिर से व्यक्त की थी. इस योजना के तहत म्याँमार में सभी प्रकार की हिंसा को तत्काल रोका जाना भी है.

यूएन महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने शिखर बैठक में आगाह किया था कि म्याँमार में राजनैतिक, सुरक्षा, मानवाधिकार व मानव कल्याण हालात, विनाश की ओर बढ़ रहे हैं. इस क्रम में, उन्होंने बढ़ती हिंसा, ग़ैर-आनुपातिक बल प्रयोग, मानवाधिकारों की बदतर स्थिति पर गहरा क्षोभ प्रकट किया था.

इस बीच, म्याँमार के सैन्य नेतृत्व ने लगभग 50 हज़ार लोगों को अनौपचारिक बस्तियों से जबरन बाहर निकाला है, और व्यवस्थागत ढंग से घर ढहाए गए हैं. संयुक्त राष्ट्र के दो स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इन मामलों को बुनियादी मानवाधिकार दायित्वों का हनन क़रार दिया है. समाचारों के अनुसार, उत्तरी यंगून के मिंगालाडॉन टाउनशिप में अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले 40 हज़ार से अधिक निवासियों को बिना वैकल्पिक आवास या भूमि के ही बेदख़ल कर दिया गया है.

Anzarul Bari
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पिछले 23 सालों से डेडीकेटेड पत्रकार अंज़रुल बारी की पहचान प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया में एक खास चेहरे के तौर पर रही है. अंज़रुल बारी को देश के एक बेहतरीन और सुलझे एंकर, प्रोड्यूसर और रिपोर्टर के तौर पर जाना जाता है. इन्हें लंबे समय तक संसदीय कार्रवाइयों की रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव है. कई भाषाओं के माहिर अंज़रुल बारी टीवी पत्रकारिता से पहले ऑल इंडिया रेडियो, अलग अलग अखबारों और मैग्ज़ीन से जुड़े रहे हैं. इन्हें अपने 23 साला पत्रकारिता के दौर में विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के लिए भी काम करने का अच्छा अनुभव है. देश के पहले प्राइवेट न्यूज़ चैनल जैन टीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर शो 'मुसलमान कल आज और कल' को इन्होंने बुलंदियों तक पहुंचाया, टीवी पत्रकारिता के दौर में इन्होंने देश की डिप्राइव्ड समाज को आगे लाने के लिए 'किसान की आवाज़', वॉइस ऑफ क्रिश्चियनिटी' और 'दलित आवाज़', जैसे चर्चित शोज़ को प्रोड्यूस कराया है. ईटीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर राजनीतिक शो 'सेंट्रल हॉल' के भी प्रोड्यूस रह चुके अंज़रुल बारी की कई स्टोरीज़ ने अपनी अलग छाप छोड़ी है. राजनीतिक हल्के में अच्छी पकड़ रखने वाले अंज़र सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं साथ ही अपने बेबाक कलम और जबान से सदा बहस का मौज़ू रहे है. डी.डी उर्दू चैनल के शुरू होने के बाद फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यूज़ पर आधारित स्पेशल शो 'फिल्म की ज़बान उर्दू की तरह' से उन्होंने खूब नाम कमाया. सामाजिक हल्के में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले अंज़रुल बारी 'इंडो मिडिल ईस्ट कल्चरल फ़ोरम' नामी मशहूर संस्था के संस्थापक महासचिव भी हैं.
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