Sunday, February 25, 2024
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बड़ी रोचक है स्वाति और दयाशंकर सिंह की तलाक गाथा

ठगिनी राजनीति घर को कैसे बर्बाद करती है ,इसकी बानगी दयाशंकर सिंह और स्वाति सिंह की तलाक गाथा है। छात्र राजनीति ने दोनों को साथ किया। शादी हुई और राजनीति की ऊंचाई पर भी पहुंचे लेकिन अब दोनों एक दूसरे के दुश्मन हो गए। बड़बोले बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह ने एक बार मायावती पर अभद्र टिप्पणी की थी। तब उनकी पत्नी स्वाति सिंह उनसे दूर रहते हुए भी अपने पति का पक्ष लिया और मायावती पर की गई पति की टिप्पणी को उचित बताते हुए पति के समर्थन में पति धर्म का पालन किया था। एक नयी राजनीति की शुरुआत कर यूपी की राजनीति में एक चर्चित चेहरा बानी थी।
2017 में चुनाव हुआ और वह बीजेपी से विधायक हो गई। तेज तर्रार होने की वजह से स्वाति को योगी मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। यह बात और है कि स्वाति सिंह मंत्री रहते हुए भी कई दफा विवादों में घिरी लेकिन पांच साल तक मंत्री बानी रही। इस बीच स्वाति और दयाशंकर सिंह के बीच कैसे सम्बन्ध रहे इसकी चर्चा कभी नहीं हुई। लेकिन जैसे ही 2022 के चुनाव से पहले स्वाति सिंह की सीट पर दयाशंकर सिंह ने अपना दावा किया ,दोनों के बीच तल्खी बढ़ती चली गई। बीजेपी ने स्वाति को टिकट नहीं दिता लेकिन दयाशंकर सिंह को किसी अन्य सीट से चुनाव में खड़ा कर दिया। दयाशंकर सिंह चुनाव जीत भी गए लेकिन स्वाति सिंह राजनीति से विदा कर दी गई। आने वाले समय में स्वाति की राजनीति क्या होगी कोई नहीं जानता लेकिन मौजूदा वक्त में अब पति पत्नी के बीच तलाक की नौबत आ गयी है। दोनों के रिश्ते टूट गए हैं और अब मामला अदालत तक पहुँच गया है। तलाक को लेकर पांच मई को सुनवाई होने की सम्भावना है।
स्वाति सिंह का परिवार मूल रूप से यूपी के बलिया से है। लेकिन पिता स्टील सिटी बोकारो में नौकरी करते थे, तो स्वाति का जन्म और लालन-पालन भी वहीं हुआ है। शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद स्वाति ने आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ का रुख किया। लखनऊ यूनिवर्सिटी में वो पहली बार दयाशंकर सिंह से मिलीं। दयाशंकर उस समय एबीवीपी से जुड़े थे और छात्र राजनीति में काफी सक्रिय थे। स्वाति भी धीरे-धीरे राजनीति से जुड़ीं। राजनीति के दांव-पेंच सीखते-सीखते दोनों प्यार में पड़े और फिर परिवार की सहमति से दोनों ने शादी कर ली।
छात्र राजनीति ने दोनों को मिलाया और मूल राजनीति ने दोनों को विलग कर दिया। बात 2016 की है। दयाशकंर सिंह ने बसपा सुप्रीमो मायावती को लेकर विवादित बयान दिया। दयाशकंर ने मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए उनके लिए अपशब्द बोला। जाहिर सी बात है विवाद होना था और वैसा ही हुआ। हर तरफ बयान की आलोचन होने लगी और भाजपा से दयाशंकर सिंह पर कार्रवाई की मांग उठने लगी। उस समय नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी बसपा के राष्ट्रीय महासचिव थे। वो अपने कुछ समर्थकों के साथ लखनऊ के हजरतगंज चौराहे पर विरोध-प्रदर्शन करने पहुंचे। प्रदर्शन के दौरान उन्होंने दयाशंकर वाली गलती दोहराते हुए उनकी मां, पत्नी और बेटी को घसीट लिया। स्वाति सिंह नसीमुद्दीन के बयान पर फायर हो गईं। दयाशंकर अपने बयान के चलते बैकफुट पर चले गए थे। लेकिन जवाब में आई नसीमुद्दीन की टिप्पणी पर स्वाति सिंह ने उन्हें आड़े हाथों लिया। उन्होंने मोर्चा संभाल लिया। स्वाति सिंह ने बसपा प्रमुख मायावती को अपने खिलाफ चुनावी मैदान में उतरने की चुनौती दे डाली।
याद रहे स्वाति सिंह पर भी घरेलू हिंसा का आरोप लगा चुका है। उनकी भाभी ने मारपीट, बिना तलाक लिए भाई की दूसरी शादी कराने का जैसे गंभीर आरोप लगाए थे।
दयाशंकर और नसीमुद्दीन की उस शर्मनाक हरकत पर अलग-अलग तरीके से कार्रवाई हुई। एक तरफ जहां भाजपा ने दयाशंकर को 6 साल के लिए निलंबित कर दिया तो वहीं दयाशंकर सिंह की मां की तरफ दर्ज कराए गए एफआईआर की वजह से नसीमुद्दीन को जेल जाना पड़ा। भाजपा ने सेफ गेम खेलते हुए दयाशंकर सिंह को पार्टी से निकाला और रिप्लेसमेंट में महिला कार्ड खेलने वाली स्वाति सिंह को ले आए। स्वाति सिंह को भाजपा महिला प्ररोष्ठ का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इस तरह से स्वाति सिंह राजनीति में आईं और शुरुआत से ही फायर ब्रांड नेता की छवि बनाए रखा।साल 2017 में स्वाति सिंह को पार्टी ने सरोजनी नगर सीट से चुनावी मैदान में उतारा। जीतने के बाद उन्हें योगी सरकार में मंत्री भी बनाया गया।
वैसे तो दोनों ने लव मैरिज की थी लेकिन कई मौकों पर दोनों के बीच मनमुटाव की खबर आती रही। साल 2008 में स्वाति सिंह पति के खिलाफ मारपीट का एफआईआर दर्ज कराया था। इसके अलावा स्वाति सिंह का एक ऑडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वो ये कहती हैं कि दयाशंकर सिंह उनसे बहुत मारपीट करते हैं। बहुत खराब आदमी से मेरी शादी हो गई है। स्वाति सिंह ने साल 2012 में तलाक के लिए कोर्ट पहुंची थीं। लेकिन मंत्री बनने के बाद केस की पैरवी बंद कर दी। 2018 में फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के कोर्ट नहीं पहुंचने पर केस बंद कर दिया था।
अब स्वाति और दयाशंकर सिंह फिर अलग हैं। दोनों की रहे भी अलग हो गई है। दयाशंकर सिंह इस चुनाव में विधायक बन गए हैं। संभव है कि इस बार योगी मंत्रिमंडल में वे शामिल भी हो जाए। लेकिन स्वाति सिंह का क्या होगा ? बीजेपी उसके लिए क्या करेगी यह एक अलग सवाल है। मौलिक सवाल तो यह है कि आखिर जिस राजनीति ने दोनों को एक साथ लाने का काम किया था अब वही राजनीति दोनों को विलग भी कर रही है। राजनीति का यह चरित्र लुभाता भी है और भरमाता भी है।

अखिलेश अखिल
अखिलेश अखिल
पिछले 30 वर्षों से मिशनरी पत्रकारिता करने वाले अखिलेश अखिल की पहचान प्रिंट, टीवी और न्यू मीडिया में एक खास चेहरा के रूप में है। अखिल की पहचान देश के एक बेहतरीन रिपोर्टर के रूप में रही है। इनकी कई रपटों से देश की सियासत में हलचल हुई तो कई नेताओं के ये कोपभाजन भी बने। सामाजिक और आर्थिक, राजनीतिक खबरों पर इनकी बेबाक कलम हमेशा धर्मांध और ठग राजनीति को परेशान करती रही है। अखिल बासी खबरों में रुचि नहीं रखते और सेक्युलर राजनीति के साथ ही मिशनरी पत्रकारिता ही इनका शगल है। कंटेंट इज बॉस के अखिल हमेशा पैरोकार रहे है।
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